भारत में बाघों की संख्या और उनका संरक्षण
भारत दुनिया में बाघों की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। वैश्विक स्तर पर मौजूद बाघों की कुल संख्या का लगभग 70% बाघ भारत में पाए जाते हैं। यह केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि सरकार और विभिन्न संस्थानों द्वारा किए गए संरक्षण प्रयासों का भी परिणाम है। बाघों की संख्या को बढ़ाने और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा के लिए भारत में टाइगर रिजर्व और “प्रोजेक्ट टाइगर” जैसी पहल चलाई गई हैं।
मध्य प्रदेश: “टाइगर स्टेट” का नया रिकॉर्ड
मध्य प्रदेश लंबे समय से “टाइगर स्टेट” के रूप में जाना जाता है क्योंकि यहां सबसे अधिक बाघों की संख्या दर्ज की गई है। अब एक और उपलब्धि के रूप में, राज्य में 58वां टाइगर रिजर्व स्थापित किया गया है। इस नए टाइगर रिजर्व का नाम “माधव नेशनल पार्क” है, जो अब मध्य प्रदेश का नौवां टाइगर रिजर्व बन गया है।
माधव नेशनल पार्क: नया टाइगर रिजर्व
माधव नेशनल पार्क मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित है। इसे वर्ष 1958 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा प्राप्त हुआ था और यह लगभग 355 से 375 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में दो प्रमुख झीलें—सांख्य सागर झील और माधव सागर झील स्थित हैं, जहां बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षी आते हैं।
यह राष्ट्रीय उद्यान ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। ब्रिटिश काल और मुगल शासन के दौरान यह क्षेत्र शिकारगाह के रूप में उपयोग किया जाता था। ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा यहां बड़ी संख्या में बाघों का शिकार किया गया था, जिससे बाघों की आबादी काफी कम हो गई थी। लेकिन आज यह क्षेत्र संरक्षण प्रयासों के कारण फिर से बाघों के लिए सुरक्षित आवास बन चुका है।
मध्य प्रदेश के अन्य टाइगर रिजर्व
मध्य प्रदेश में अब कुल 9 टाइगर रिजर्व हैं:
- कान्हा टाइगर रिजर्व
- पेंच टाइगर रिजर्व
- बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व
- सतपुड़ा टाइगर रिजर्व
- पन्ना टाइगर रिजर्व
- संजय डबरी टाइगर रिजर्व
- राता पानी टाइगर रिजर्व
- वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व
- माधव टाइगर रिजर्व (नया घोषित)
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और प्रोजेक्ट टाइगर
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत कार्यरत एक वैधानिक निकाय है, जिसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत वर्ष 2006 में स्थापित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य प्रोजेक्ट टाइगर के तहत देश में बाघों की आबादी को संरक्षित करना और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना है।
प्रोजेक्ट टाइगर:
- शुरुआत: 1973 में
- उद्देश्य: बाघों के संरक्षण के लिए सुरक्षित स्थान (टाइगर रिजर्व) विकसित करना
- प्रारंभिक टाइगर रिजर्व: 9 (अब बढ़कर 58 हो चुके हैं)
- वर्तमान कुल क्षेत्र: 75,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक
बाघों का वैज्ञानिक वर्गीकरण और उनकी उप-प्रजातियां
बाघ का वैज्ञानिक नाम “पैंथेरा टाइग्रेस” (Panthera tigris) है। भारत में पाए जाने वाले बाघों को “बंगाल टाइगर” कहा जाता है, जिनका वैज्ञानिक नाम “पैंथेरा टाइग्रेस टाइग्रेस” है।
विश्वभर में बाघों की 8 उप-प्रजातियां थीं, जिनमें से 3 विलुप्त हो चुकी हैं:
- बंगाल टाइगर (भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान)
- साइबेरियन टाइगर (रूस, चीन, उत्तर कोरिया)
- सुमात्रण टाइगर (इंडोनेशिया)
- इंडो-चाइनीज टाइगर (दक्षिण पूर्व एशिया)
- मलायन टाइगर (मलेशिया)
- कैस्पियन टाइगर (विलुप्त)
- जावन टाइगर (विलुप्त)
- बाली टाइगर (विलुप्त)
भारत में बाघ संरक्षण के प्रमुख कानून और पहल
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: बाघों को अनुसूची-I में शामिल किया गया है, जिससे उन्हें अधिकतम कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है।
- IUCN रेड लिस्ट: बाघों को “लुप्तप्राय (Endangered)” श्रेणी में रखा गया है।
- CITES (Convention on International Trade in Endangered Species): बाघों के अंगों और उत्पादों के अवैध व्यापार को रोकने के लिए इसे परिशिष्ट-I में सूचीबद्ध किया गया है।
- इंटरनेशनल बिग कैट्स एलायंस (International Big Cats Alliance): भारत द्वारा शुरू की गई पहल, जिसमें 7 बड़ी बिल्लियों (बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, चीता, जगुआर और प्यूमा) के संरक्षण पर ध्यान दिया जाता है।
बाघों का संरक्षण क्यों महत्वपूर्ण है?
- वनों का संरक्षण: बाघों की उपस्थिति स्वस्थ जंगलों का प्रतीक है।
- पर्यावरण संतुलन: बाघ खाद्य श्रृंखला में शीर्ष पर होते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखते हैं।
- पर्यटन और आजीविका: बाघ अभयारण्य पर्यटन को बढ़ावा देते हैं, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है।
निष्कर्ष
माधव नेशनल पार्क को 58वें टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित किया जाना भारत के बाघ संरक्षण प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मध्य प्रदेश न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए बाघों के संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र बन गया है। प्रोजेक्ट टाइगर और अन्य सरकारी प्रयासों की वजह से आज बाघों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है, जो एक सकारात्मक संकेत है।
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