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हैदराबाद के जंगलों पर बुलडोज़र: विकास की दौड़ या प्रकृति की हार? छात्रों की आवाज़ और सुप्रीम कोर्ट की सख़्ती

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद इन दिनों एक पर्यावरणीय संकट का केंद्र बनी हुई है। शहर के कांचा गाची बोवली इलाके में फैले हरे-भरे जंगल पर विकास के नाम पर बुलडोज़र चलने लगे हैं। इस कदम ने न केवल पर्यावरण प्रेमियों, बल्कि छात्रों और सामाजिक संगठनों को भी सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया है।

रात का हमला: जब पेड़ों की चीख सुनाई दी

30 मार्च की रात को, जब अधिकांश छात्र अपने घरों में थे, तभी अंधेरे में जंगल में बुलडोज़र घुसाए गए और बड़ी संख्या में पेड़ काट दिए गए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में साफ़ सुना जा सकता है—बेज़ुबान जानवरों की चीखें और मशीनों की क्रूर गूंज। यह सब उस ज़मीन पर हुआ जिस पर हाईकोर्ट ने कटाई पर रोक लगाई थी।

कांचा गाची बोवली: एक जैविक खजाना

यह जंगल केवल हरियाली नहीं, बल्कि 734 प्रकार की वनस्पतियाँ, 237 प्रजातियों के पक्षी, 15 तरह के सरीसृप और 10 स्तनधारी प्रजातियों का प्राकृतिक घर है। यही नहीं, यहां स्थित ढाई अरब साल पुरानी मशरूम रॉक, विज्ञान के लिए भी अमूल्य धरोहर है।

छात्रों का प्रतिरोध: कल के लीडर्स ने उठाई आज की ज़िम्मेदारी

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों ने इस विनाश के खिलाफ मोर्चा खोला। 3 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर जुटाए गए, जन जागरूकता अभियान चलाया गया और कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया। छात्रों ने साफ कहा—“हम विकास के विरोध में नहीं हैं, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं।”

सरकार का पक्ष: उद्योगों के लिए ज़मीन, विकास की नींव

तेलंगाना सरकार ने यह 400 एकड़ ज़मीन TSIIC को हस्तांतरित की है, जहां आईटी हब और व्यावसायिक इमारतों का निर्माण प्रस्तावित है। इससे राजस्व में बढ़ोत्तरी और रोज़गार की संभावनाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन सवाल वही है—क्या हम पेड़ों के शव पर शहर बनाना चाहते हैं?

सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और केंद्र का हस्तक्षेप

छात्रों की पहल के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। कोर्ट ने तस्वीरों को “अलार्मिंग” बताया और तत्काल प्रभाव से सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी। केंद्र सरकार ने राज्य से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और एक जाँच कमेटी का गठन किया गया है जिसमें छात्रों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है।

राजनीति गरमाई, पर्यावरण चेतना जागी

पूर्व मंत्री के.टी. राम राव, बीजेपी, समाजवादी पार्टी और कई फिल्मी हस्तियों ने सरकार की आलोचना की है। वहीं दूसरी ओर, आम जनता में भी यह सवाल उठ रहा है—क्या विकास का मतलब हमेशा विनाश ही होगा?

प्रकृति और प्रगति के बीच संतुलन ही टिकाऊ विकास की कुंजी है। अगर आज हमने पेड़ों की जगह सीमेंट बो दिया, तो कल सांस लेने के लिए हवा भी खरीदनी पड़ेगी।

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