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हाथी और ड्रैगन का साथ? मोदी के इंटरव्यू में चीन पर बदले सुर और बदलते वैश्विक समीकरण

नमस्कार दोस्तों! स्वागत है आपका Khabar Buzz पर। आज हम एक ऐसे विषय पर चर्चा करेंगे, जिसने न केवल भारतीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया इंटरव्यू, जिसमें उन्होंने चीन को लेकर अपने बदले हुए रुख पर बात की। सवाल यह उठता है कि क्या भारत (हाथी) और चीन (ड्रैगन) एक नई साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं? यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि एक ओर अमेरिका ब्रिक्स देशों पर व्यापारिक दबाव बना रहा है, और दूसरी ओर भारत चीन के प्रति नरम रवैया अपनाता दिख रहा है।

मोदी का इंटरव्यू और बदलती धारणा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में प्रसिद्ध पॉडकास्टर लेक्स फ्रीडमैन को एक विस्तृत इंटरव्यू दिया। लगभग तीन घंटे लंबे इस साक्षात्कार में कई मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन सबसे अधिक ध्यान खींचा चीन के साथ भारत के संबंधों पर प्रधानमंत्री के विचारों ने। उन्होंने कहा कि भारत और चीन का सहयोग केवल इन दो देशों के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता और समृद्धि के लिए भी आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि 21वीं सदी एशियाई देशों की सदी होगी, और प्रतिस्पर्धा के बावजूद, दोनों देशों को विवादों से बचना चाहिए।

कौन हैं लेक्स फ्रीडमैन?

इस इंटरव्यू को समझने से पहले, यह जानना जरूरी है कि आखिर लेक्स फ्रीडमैन कौन हैं।

मोदी के बयान और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

मोदी ने भारत-चीन संबंधों का ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि पुराने समय में दोनों देश वैश्विक GDP में 50% से अधिक का योगदान देते थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत और चीन को अपने मतभेदों को विवाद में बदलने से बचना चाहिए और बातचीत के माध्यम से स्थायी समाधान निकालना चाहिए।

इतिहास पर नजर डालें तो—

हालांकि, 1962 के युद्ध और हाल के सीमा विवादों (गलवान घाटी की घटना) के कारण दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हो गए थे। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं।

क्या भारत-चीन संबंधों में नया मोड़ आएगा?

हाल ही में, चीन ने भी मोदी के बयान का सकारात्मक जवाब दिया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने की जरूरत है।

मुख्य कारण जो भारत-चीन को करीब ला सकते हैं:

  1. ब्रिक्स और वैश्विक राजनीति – अमेरिका ब्रिक्स देशों पर आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी दे रहा है, जिससे भारत और चीन को साथ आने की मजबूती मिल सकती है।
  2. आर्थिक सहयोग – भारत को चीन से मैन्युफैक्चरिंग और तकनीक के क्षेत्र में सीखने की जरूरत है।
  3. कूटनीतिक स्थिरता – दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध एशिया में स्थिरता और विकास को बढ़ावा देंगे।

क्या चुनौतियां बनी रहेंगी?

हालांकि, व्यापार असंतुलन, सीमा विवाद और भू-राजनीतिक तनाव भारत-चीन के संबंधों को प्रभावित करते रहेंगे। लेकिन बातचीत और कूटनीति से इन चुनौतियों को हल किया जा सकता है।

निष्कर्ष: एशियाई शताब्दी की ओर बढ़ते कदम?

प्रधानमंत्री मोदी के इस नए रुख के बाद यह सवाल उठता है कि क्या भारत और चीन एक नई साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं? क्या एशिया वैश्विक शक्ति केंद्र बनने की राह पर है?

आपका क्या विचार है? क्या भारत और चीन को अपने मतभेद भुलाकर सहयोग पर ध्यान देना चाहिए, या पुरानी कड़वाहट को ध्यान में रखते हुए सतर्क रहना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर दें।

धन्यवाद!

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